गुरुवार, 2 मार्च 2017

दोहे और मुक्तक

दो दोहे-

हिंदी  जैसी  है  नहीं, दूजी  भाषा  और।
सब भाषाओं की यही, हिंदी है सिरमौर।

सबके होठों पर सजी, भारत माँ की शान।
हिंदी भाषा  बोलकर, मिलता  है सम्मान।

दो मुक्तक-

झुके कन्धों  के  हाले-दर्द  को  बेटी  समझती है।
छिपे दिल में जो हैं जज्बात वो बेटी समझती है।
सदा भईया के हर ताने पे बेहद  खिलखिलाते हैं,
हँसें  झूठी  हँसी माँ-बाप  तो  बेटी  समझती है।

लड़ी हर  जंग  जीवन  की कभी  हिम्मत नहीं हारी।
तुम्हें  खुश  देखने  को ही  गला  दी  उम्र  भी  सारी।
शिथिल जब हो गई है आज, तुम पर बोझ लगती है,
तुम्हें  पैदा  किया  जिसने  वही  माँ  आज  बेचारी। 
                              -विकास सोनी'ऋतुराज'

https://www.youtube.com/watch?v=1oF8IjwQd88

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