बुधवार, 8 मार्च 2017

एक मुक्तक-तड़प

लिखे जा रहे हम ग़ज़ल गीत मुक्तक।
मगर चाहतों पर,  हमारी, तुम्हें शक।
तुम्हें  रात-दिन  चाहना,  याद करना,
पहुँचती नहीं क्यों तड़प मेरी तुम तक।
                  -विकास सोनी ऋतुराज

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