गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

लिखे जिसकी मुहब्बत में ग़ज़ल कुछ गीत कुछ मुक्तक।
हमारी चाह थी इतनी कि पहुँचे आह बस उस तक।
बिना जाने हक़ीक़त रूठकर वो चल दिया ऐसे,
उसे शायद हमारी चाहतों पर हो रहा है शक़।
                        -विकास सोनी 'ऋतुराज'

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

प्यास दिल की बुझे

रात से कोई मैसेज न मुझको मिला,
ऑनलाइन न कल से दिखे हो मुझे।
हो सके दो मिनट कॉल कर लो ज़रा,
बात कर लूं ज़रा, प्यास दिल की बुझे।
                 -विकास सोनी 'ऋतुराज'

मंगलवार, 28 मार्च 2017

जय माता दी

                                                   फिर से देखो आ गए, नवराते त्यौहार l
                                                 माँ तुम से विनती यही, कर दो बेड़ा पार ll
                                                                           -विकास सोनी 'ऋतुराज'
              

गुरुवार, 16 मार्च 2017

तीन दोहे

सर चढ़ कर बोले नशा, होली का इस बार,
नफरत को हम भूल कर, बाटें सब में प्यार।
जोगीरा सारा रा रा

राधा पिचकारी भरे, सखियों को ले संग।
मोहन दिख जाए कहीं, मल दूँ उसके रंग।
जोगीरा सारा रा रा

बैठे तुम उस पार हो, मैं बैठा इस पार,
आखिर कैसे फिर मने, होली का त्यौहार।
जोगीरा सारा रा रा
               
                         -विकास सोनी ऋतुराज

बुधवार, 8 मार्च 2017

एक मुक्तक-तड़प

लिखे जा रहे हम ग़ज़ल गीत मुक्तक।
मगर चाहतों पर,  हमारी, तुम्हें शक।
तुम्हें  रात-दिन  चाहना,  याद करना,
पहुँचती नहीं क्यों तड़प मेरी तुम तक।
                  -विकास सोनी ऋतुराज

सोमवार, 6 मार्च 2017

एक मुक्तक- देखो मेरे आँगन में



 रोज सवेरे आए चिड़िया
देखो मेरे आँगन में।
गीत मधुर फिर गाए चिड़िया
देखो मेरे आँगन में।
दूर खड़े होकर यह जाना
चिन्ता उसको बच्चों की,
दे दाना उड़ जाए चिड़िया
देखो मेरे आँगन में।
                   -विकास सोनी ऋतुराज 

गुरुवार, 2 मार्च 2017

दोहे और मुक्तक

दो दोहे-

हिंदी  जैसी  है  नहीं, दूजी  भाषा  और।
सब भाषाओं की यही, हिंदी है सिरमौर।

सबके होठों पर सजी, भारत माँ की शान।
हिंदी भाषा  बोलकर, मिलता  है सम्मान।

दो मुक्तक-

झुके कन्धों  के  हाले-दर्द  को  बेटी  समझती है।
छिपे दिल में जो हैं जज्बात वो बेटी समझती है।
सदा भईया के हर ताने पे बेहद  खिलखिलाते हैं,
हँसें  झूठी  हँसी माँ-बाप  तो  बेटी  समझती है।

लड़ी हर  जंग  जीवन  की कभी  हिम्मत नहीं हारी।
तुम्हें  खुश  देखने  को ही  गला  दी  उम्र  भी  सारी।
शिथिल जब हो गई है आज, तुम पर बोझ लगती है,
तुम्हें  पैदा  किया  जिसने  वही  माँ  आज  बेचारी। 
                              -विकास सोनी'ऋतुराज'

https://www.youtube.com/watch?v=1oF8IjwQd88

लिखे जिसकी मुहब्बत में ग़ज़ल कुछ गीत कुछ मुक्तक। हमारी चाह थी इतनी कि पहुँचे आह बस उस तक। बिना जाने हक़ीक़त रूठकर वो चल दिया ऐसे, उसे शायद ह...